चन्द्रवंशीय जाधव (पौराणिक यादवा /यदुवंशी )राजपूतों के राज्य देवगिरि का ऐतिहासिक अध्ययन--

चन्द्रवंशीय जाधव (पौराणिक यादवा /यदुवंशी ) राजपूतों के राज्य देवगिरि (दौलताबाद )का ऐतिहासिक अध्ययन---

"यहां ये उल्लेखित करना आवश्यक है कि भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों ने "यादवा " शब्द को संस्कृति भाषा का शब्द लिखा है जिसका हिन्दी में अर्थ "जादव " है।ब्रज भाषा में" य" वर्ण का उच्चारण "ज" बोला जाता है
हिन्दी साहित्य का अध्ययन के अध्ययन करने पर पाया गया कि " यादवा या यादव " शब्द का अपभ्रंशरूप 16 वीं - 17 वीं शताब्दी के भक्ति काल में  दिखाई देता है। कुछ विद्वानों के अनुसार "यादव" संस्कृति का शब्द है जिसका  हिंदी  "जादव " है जिससे "जादों " हुआ ।भक्ति रचनाओं में तुलसीदास एवं सूरदास  ने अपने श्रेष्ठ रचनाओं जैसे रामायण ,सूरसागर ,आदि में जदुवंश ,जादों ,जदुपति ,जादवपति ,जादोंराय आदि शब्दों का प्रयोग बहुतायत से किया है ।
तुलसीदास जी ने रामायण में कुछ इस प्रकार लिखा है---
         जब जदुबंस कृष्न  अवतारा।
           होइहि हरन महा महिभारा।।
        कृष्न तनय होइहि पति तोरा ।। .
        बचनु अन्यथा होइ न मोरा।
  इसी प्रकार  इस चौपाई में भी यद्धपि के स्थान पर जद्धपि शब्द लिखा गया है ।     
जद्धपि जग दारुन दुःख नाना।
सबते कठिन जाति अपमाना ।।
इसी प्रकार कुछ अन्य कवियों के छंदों में भी "य"के स्थान पर "ज" शब्दावली का प्रयोग किया गया है जो इस प्रकार है---
उग्रसेन नृप के तपत , यह न सभा तुम योग्य।
अव मथुरा भेजहु अरहि ,भुव पति जदुकुल योग्य।।
तुमसौं कौं रन एरियो , जदुवंश नारद हूं कहो।
जवनेस सो सुनि इक्क ,संकु अनीक लै दूत उम्महो।।
जिहिं आयकैं मथुरापुरी ,जरदाय जादव बुल्लये ।
जव वेश माधव रात, सुब्बहि जानि माधव नै लये।।
वसुदेव जादव को तनुज ,रु कृष्ण नामक नाम है।
बृंयहू कहो तब विष्णु हो ,मम बेर -बेर प्रनाम है।।
हमसों जुगान्तर  मैं पूरा मुनि वृद्ध गर्ग यहें कही।
जदुवंस मैं बसुदेव ग्रह ,अवतार हरि लैहिऐं सही ।।

अतः चक्रवर्ती चन्द्रवंशीय क्षत्रिय महाराजा  नहुष के पुत्र ययाति के ज्येष्ठ पुत्र "यदु " से  प्रारम्भ हुए कुल को यदु-कुल या यदुवंश  तथा उनके वंशजों को  यादव या यदुवंशी क्षत्रिय कहा गया है।इसके प्रमाण सनातन वेदों ,उपनिषदों ,पुराणों ,महाभारत ,तथा अठारह वीं सदी के बाद लिखे गए  क्षत्रियों के कुलों के आधुनिक  इतिहास में भी भारतीय इतिहासकारों,लेखकों  एवं 18वीं से 19वीं शताब्दी के अंग्रेज इतिहासकारों जैसे कर्नल टॉड , सी.टी. मेटकाल्फ़ , एम.कनिंगघम , कैप्टन पी पावउलेट ,कैप्टन बिंगले , एम.ऐच ,इलियट , एम.ए.शेररिंग , जेम्स बुरग्रेस , ऐच.ए.रोस , आर.वी. रसेल ,  ब्रिग्स जॉन ,    विलियम क्रूके, जे.डव्लू.वाटसन , एफ .एस .ग्राउस , एफ .ई . पार्जितर , मेजर एच.ई. ड्रेक -ब्रोचमन ,सी.एस.बेयलेय , आदि ने भी अपनी भारतीय राजवंशों पर लिखी पुस्तकों में ,इनके द्वारा तत्कालीन लिखे हुए विभिन्न प्रान्तों के डिस्ट्रिक्ट गैज़ेटीयर्स (मथुरा , गुणगांव,अलवर ,भरतपुर ,अलीगढ़ ,एटा ,मैनपुरी ,वनारस , बांदा , मिर्जापुर , बदायूं , मुरादाबाद) तथा हरियाणा, पंजाब ,महाराष्ट्र ,कर्नाटक एवं गुजरात प्रान्तों के गजेटियर्स में भी वर्णित भारतीय वंश एवं जातियों (Tribes &Castes ) का वर्णन किया है उसमे भी वर्तमान करौली राज्य जादों राजवंश ,जैसलमेर राज्य के भाटी यदुवंशी राजवंश ,देवगिरि राज्य के जादव राजवंश ,कच्छ एवं भुज के जडेजा राजवंश ,जूनागढ़ के चुडासमा ,रायजादा ,रा खगार ,सरवैया राजवंशो  , तथा मैसूर के ओड़ियार या बढियार राजवंश के राजाओं के वंशजों को "यादवा या यदुवंशी क्षत्रिय लिखा है ।स्वयं कर्नल जेम्स टॉड नें अनाल्स ऑफ जैसलमेर में भाटी वंश के इतिहास में समस्त यदुवंशियो के लिए यदु और जादों  शब्दों का प्रयोग किया  है। अनेकों भारतीय इतिहासकारों ने भी इन राजवंशों के वंशजों के नाम के साथ "यादव या यदुवंशी " वंश उपनाम भी लिखा है जिसके अनेकों प्रमाण है। शोधों से ये ज्ञात होता है कि इतिहासानुर भक्तिकाल से पूर्व चन्द्रवंशीय क्षत्रिय यदुवंशीयों के लिये "यादवा "शब्द का प्रयोग हुआ है ।कुछ पशुपालक जातियों ने तो 1920 ई0 के बाद अपने आप को श्रीकृष्ण भगवान का वंशज घोषित करने के उद्देश्य से इस "यादव " शब्द को अपने नामों के साथ जोड़ कर अपने को श्री कृष्ण या यदु के वंशज बनने  प्रयास किया है जो निःशन्देह झूठ है।

13वीं शताब्दी में दकन की राजनीति में छाए रहने वाले चन्द्र वंशीय क्षत्रियों के यादव वंश का इतिहास 9 वीं शताब्दी के अंत से आरंभ होता है ।देवगिरि के यादव क्षत्रियों का वर्णन चन्द्रवरदाई ने अपने ग्रंथ पृथ्वीराज रासो में भी वर्णित किया है।उसके अनुसार पृथ्वीराज चौहान का विवाह देवगिरि नरेश भानु की पुत्री शशिव्रता के साथ होना भी लिखा है।
यहां के यादववंशी जाधव क्षत्रियों के पूर्वज भी पौराणिक यदुवंशी क्षत्रियों के वंशजों में से हैं , जो मूलरूप से मथुरा में रहते थे और फिर काठियावाड़ में द्वारवती अथवा द्वारका की ओर चले गये थे।ये  मूलतः द्वारका से दकन आये हुए प्रवासी थे ,जिसकी पुष्टि खानदेश में स्थित उनका एक सामन्त वंश काठियावाड़ के अन्य शहर वलभि से आये हुए प्रवासी के रूप में प्रसिद्ध हैं ।देवगिरि के यादवा राजपूत (क्षत्रिय )ताप्ती से कृष्णा तक सम्पूर्ण पश्चिमी -दक्खन के स्वामी थे।
देवगिरि के यदुवंशियों के मान्यखेत के राष्ट्रकूटों तथा कल्याणी के चालुक्यों के सामन्त के रूप  में खानदेश ,नासिक तथा अहमदनगर पर प्रारम्भ से ही शासन किया इस वंश का संस्थापक दृढ़प्रहार था।कहा जाता है कि दृढ़प्रहार के पिता का नाम सुबाहु था ।सुबाहू ने अपने 4 पुत्रों में अपने राज्य को विभाजित किया था ।दूसरे पुत्र दृढ़प्रहार सुबाहू के साम्राज्य  का दक्षणी भाग दिया गया ।इनके अन्य 3 भाइयों एवं उनके पैतृक भाग के विषय में कोई जानकारी नहीं है।

दृढ़प्रहार --

इस यादव राजवंश के भाग्य का उदय करने वाला तथा उसे विशिष्टता प्रदान करने वाला पहला सदस्य दृढ़प्रहार था।जैन परम्परा के अनुसार वह पिता की मृत्यु के बाद पैदा हुआ था तथा उसकी माता को जैनप्रभुसुरि ने द्वारिका के अग्निकांड में बचाया था और एक नवीन स्थल पर दृढ़प्रहार का जन्म हुआ ।जिस क्षेत्र में इसका जन्म हुआ वह क्षेत्र डाकुओं एवं लुटेरों से ग्रसित था।इसका संभावित समय 860 ई0 के लगभग है।इन दिनों राष्ट्रकूटों में अमोधवर्ष प्रथम शासन कर रहा था ।भोज प्रथम एवं अमोधवर्ष के कारण नासिक एवं खानदेश में अराजकता की स्थिति उतपन्न हो गई थी।सम्भवतः विन्ध्य की जन जातियों की लुटेरी प्रवृतियों से  इन क्षेत्रों में लोगों पर आतंक छाया होगा ।दृढ़प्रहार ने उनकी रक्षा कर एक योद्धा के रूप में अपनी योग्यता सिद्ध की ।इस प्रकार उसने अपने वंश को प्रमुखता प्रदान की ।उसने नासिक से 42 मील दूर उत्तर पूर्व की दिशा में चन्द्रादित्यपुर अर्थात आधुनिक चन्दौर नगर की स्थापना की तथा उसे अपना प्रधान कार्यालय बनाया ।
सेउणचन्द्र --
दृढ़प्रहार के पुत्र सेउणचंद्र ने ही पहली बार अपने वंश को सामंतीय स्तर दिलाया ।13 वीं शताब्दी तक न केवल महाराष्ट्र अपितु कर्नाटक एवं तेलंगान में भी उसका वंश एवं वंशधन उसी के अर्थात सेउणवंश तथा सेउणदेश , नाम से प्रसिद्ध रहा ।उसने अपने ही नाम पर सिंदिनेरि पर सेउणपुर नामक नवीन शहर की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया ।यह शहर सम्भवतः नासिक जिले में स्थित आधुनिक सिन्नर ही है।ऐसा प्रतीत होता है कि सेउणचन्द्र ने प्रतिहारों के विरुद्ध हो रहे युद्धों में राष्ट्रकूटों की सहायता की तथा उसकी इन सेवाओं के बदले उसे सामंतीय स्तर प्रदान किया गया ।सम्भवतः उसके प्रदेश का विस्तार नासिक जिले के बाहर न था ।उसका शासनकाल लगभग 880ई0से 900ई0 तक मानना चाहिए।
वंश के अगले तीन शासक , दाढ़ीयप्प , भिल्लम प्रथम तथा राजिरा , ने 900 से 950 ई0 के मध्य तक राज्य  किया।उसके बाद वंदुगि अथवा बड्डीग आया जिसके काल में वंश ने राजनीतिक प्रमुखता प्राप्त की क्यों कि उसने राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय के छोटे भाई धोरप्प की पुत्री अर्थात शाही राष्ट्रकूट परिवार की राजकुमारी वोहियत्वा से विवाह किया था ।यह कुमार प्रसिद्ध योद्धा था जिसने अपने सामंतीय अधिराज एवं चाचा ससुर कृष्ण तृतीय के अनेक अभियानों में सक्रिय भाग लिया।अतः बहुत संभव है कि कृष्ण ने अपने उत्साही दामाद की जागीर में वृद्धि का आदेश दिया हो।किन्तु बडिडग के अधीन यादव राज्य का निश्चित विस्तार ज्ञात नहीं है।
अगला शासक धाडियस (लगभग 970-85ई0 ) पुनः ऐसा राजा है ,जिसके बारे में कुछ जानकारी प्राप्त है।उसी के शासनकाल में राष्ट्रकूट साम्राज्य का अंत हुआ ,किन्तु यह ज्ञात नहीं है कि उसने इस संकट काल में अपने शाही संबंधी को सहायता दी अथवा नहीं।
भिल्लम द्वितीय ---

हाडियस के पुत्र एवं उत्तराधिकारी भिल्लम द्वितीय ने अपनी राज्यस्था चालुक्यों को हस्तांतरित कर दी जिन्होंने राष्ट्रकूटों का पतन करवाया था।इस संदर्भ में द्रष्टव्य है कि भिल्लम ने स्वयं लक्ष्मी नामक राष्ट्रकूट राजकुमारी से विवाह किया।यह चालुक्यों का प्रबल समर्थक रहा जिसने परमारों के विरुद्ध चालुक्यों की महत्वपूर्ण सेवा की थी।अपनी विजयों के फलस्वरूप इसने विजयाभरण की उपाधि धारण की तथा संगमनेर में विजयाभरणेश्वर नामक शिव मंदिर का निर्माण कराया।नासिक जिले में सिन्नर नामक स्थान को राजधानी बनाया।
भिल्लम द्वितीय के बाद वेसुगि तथा भिल्लम तृतीय शासक हुए । वेसुगि की अनुमानित शासनावधि 1005 से 1025 ई0तक रही । वेसुगि ने गुजरात के चालुक्य सामन्त की पुत्री नयिल्लादेवी से विवाह किया था ।इनके बाद भिल्लम तृतीय आया और उसका  शासनकाल को 1020 तथा 1040 ई0 के मध्य मान सकते है ।भिल्लम तृतीय के सामंतीय अधिराज चालुक्य सम्राट जयसिंह प्रथम की पुत्री आवल्लदेवी से उसके विवाह द्वारा उसके शासनकाल में यादव वंश की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।

भिल्लम पंचम--
यह इस वंश का प्रथम यादव  शासक था जिसने सम्राट -स्तर का दावा किया और सम्राटोचित  उपाधियां धारण की तथा अपनी मृत्यु से 4 वर्ष पूर्व स्वाधीनता घोषित की ।इन्होंने परमारों ,चालुक्यों तथा होयसलों को पराजित कर सम्पूर्ण दक्षिणापथ को अधिकृत कर लिया ।इसने उत्तरी कोंकण एवं सम्पूर्ण महाराष्ट्र को यादव साम्राज्य का अंग बनाया।राजा भिल्लम पंचम ने 1187ई0 में स्वतंत्र राज्य स्थापित करके देवगिरि को अपनी राजधानी बनाया ।इसके बाद पंचम का पुत्र जैतुकी 1191 ई0 के लगभग यादवा सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।  जैतुकी के बाद1210 ई0 के लगभग यादव वंश का सर्वशक्तिमान शासक सिंघण देवगिरि के सिंहासन पर आसीन हुआ।इसने प्रायः सम्पूर्ण पश्चिमी चालुक्य राज्य अपने अधिकार में कर लिया ।इसका शासन 1247 ई0 तक रहा ।उत्तर में विन्ध्य पर्वतों द्वारा सुरक्षित रहने के कारण देवगिरि राज्य 11वीं से 13 वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य होने वाले विदेशी आक्रमणों से बचा रहा ।दुर्भाग्य से 13 वीं शताब्दी के अंतिम दशक में देवगिरि को तुर्की आक्रमण का सामना करना पड़ा।इस राज्य की सम्पन्नता ,समृद्धि एवं विस्तार ने इसे ईष्या का केंद बना दिया था।इस समयकाल में यादवों के देवगिरि साम्राज्य के सिंघण के बाद कृष्ण (1246-1260ई0) ,महादेव (1260-1270 ई0) , अम्मन(1270)।इसके वाद अम्मन का चचेरा भाई कृष्ण का पुत्र यादव साम्राज्य देवगिरि का शासक बना ।
अलाउद्दीन खिलजी का समकालीन देवगिरि का शासक रामचन्द्र देव था ।रामचन्द्र (1271-1311ई0 ) का राज्यरोहण 1271 ई0 के उत्तरार्द्ध में हुआ ।सन 1294 ई0 देवगिरि किले पर अलाउद्दीन खिलजी ने पहली बार चढ़ाई करके खूब लूटा ।पहले तो यदुवंशी राजा रामचन्द्र ने कर देना स्वीकार कर लिया , किन्तु बाद में उन्होंने दिल्ली के सुल्तान को खिराज देना बंद कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 1307 ,1310 एवं 1318 ई0 में मलिक काफूर ने फिर देवगिरि पर आक्रमण किये ।
देवगिरि के अंतिम शासक हरपाल(रामचन्द्र का दामाद) द्वारा स्वतंत्रता कायम करने पर 1317 ई0 में सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक ने दक्षिण की ओर प्रस्थान किया ।राजा हरपाल राजधानी छोड़कर भाग गया ; किन्तु वह पकड़ा गया और उसकी जीवित खाल खिंचवा ली गई। इस प्रकार 1318 ई0 में यादव शक्ति का अंत हो गया ।अब खिलजी सम्राट ने देवगिरि राज्य को जिलों में विभाजित करके तुर्की हुक्मरानों के सुपुर्द कर दिया गया।मुबारक ने देवगिरि में अनेक मंदिरों का विध्वंस करके उनके अवशेषों से एक मस्जिद बनवायी ।देवगिरि महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में ,गोदावरी नदी की उत्तरी घाटी में स्थित है।
1338 ई. में मुहम्मद तुग़लक ने देवगिरि को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया, क्योंकि मुहम्मद तुग़लक के विशाल साम्राज्य की देखरेख दिल्ली की अपेक्षा देवगिरि से अधिक अच्छी तरह की जा सकती थी। सुल्तान ने दिल्ली की प्रजा को देवगिरि जाने के लिए बलात् विवश किया। 17 वर्ष पश्चात् देवगिरि के लोगों को असीम कष्ट भोगते देखकर इस उतावले सुल्तान ने फिर उन्हें दिल्ली वापस आ जाने का आदेश दिया। सैकड़ों मील की यात्रा के पश्चात् दिल्ली के निवासी किसी प्रकार फिर अपने घर पहुँचे। मुहम्मद तुग़लक ने देवगिरि का नाम बदलकर दौलताबाद रखा और वारंगल के राजाओं के विरुद्ध युद्ध करने के लिए इस स्थान को अपना आधार बनाया था। किन्तु उत्तर भारत में गड़बड़ प्रारम्भ हो जाने के कारण वह अधिक समय तक राजधानी देवगिरि में नहीं रख सका।

मुहम्मद तुग़लक के राज्य काल में प्रसिद्ध अफ्रीकी यात्री इब्नबतूता दौलताबाद आया था। उसने इस नगर की समृद्धि का वर्णन करते हुए उसे दिल्ली के समकक्ष ही बताया है। राजधानी के दिल्ली वापस आ जाने के कुछ ही समय पश्चात् गुलबर्गा के सूबेदार जफ़र ख़ाँ ने दौलताबाद पर क़ब्ज़ा कर लिया और यह नगर इस प्रकार बहमनी सुल्तानों के हाथों में आ गया। यह स्थिति 1526 तक रही। अब इस नगर पर निज़ामशाही सुल्तानों का अधिकार हो गया। तत्पश्चात् मुग़ल सम्राट अकबर का अहमदनगर पर क़ब्ज़ा हो जाने पर दौलताबाद भी मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित हो गया। किन्तु पुन: इसे शीघ्र ही अहमदनगर के सुल्तानों ने वापस ले लिया। 1633 ई. में शाहजहाँ के सेनापति ने दौलताबाद पर क़ब्ज़ा कर लिया और तब से औरंगज़ेब के राज्य काल के अंत तक यह ऐतिहासिक नगर मुग़लों के हाथ में ही रहा। औरंगज़ेब की मृत्यु के कुछ समय पश्चात् मुहम्मदशाह के शासन काल में हैदराबाद के प्रथम निज़ाम आसफ़शाह ने दौलताबाद को अपनी नई रियासत में शामिल कर लिया।

देवगिरि का यादव कालीन दुर्ग एक त्रिकोण पहाड़ी पर स्थित है। क़िले की ऊँचाई, आधार से 150 फुट है। पहाड़ी समुद्र तल से 2250 फुट ऊँची है। क़िले की बाहरी दीवार का घेरा 2¾ मील है और इस दीवार तथा क़िले के आधार के बीच क़िलाबेदियों की तीन पंक्तियां हैं। प्राचीन देवगिरि नगरी इसी परकोटे के भीतर बसी हुई थी। किन्तु उसके स्थान पर अब केवल एक गांव नजर आता है। क़िले के कुल आठ फाटक हैं। दीवारों पर कहीं-कहीं आज भी पुरानी तोपों के अवशेष पड़े हुए हैं। इस दुर्ग में एक अंधेरा भूमिगत मार्ग भी है, जिसे 'अंधेरी' कहते हैं। इस मार्ग में कहीं-कहीं पर गहरे गढ़डे भी हैं, जो शत्रु को धोखे से गहरी खाई में गिराने के लिए बनाये गये थे। मार्ग के प्रवेश द्वार पर लोहे की बड़ी अंगीठियाँ बनी हैं, जिनमें आक्रमणकारियों को बाहर ही रोकने के लिए आग सुलगा कर धुआं किया जाता था। क़िले की पहाड़ी में कुछ अपूर्ण गुफ़ाएं भी हैं, जो एलोरा की गुफ़ाओं के समकालीन हैं।
यादवकालीन इमारतों के अवशेष अब नहीं के बराबर है ,केवल कालिकादेव जिसके मध्य भाग को मलिक कफूर ने मस्जिद में बदल दिया था ,मौजूद है ।

संदर्भ--
1-दक्षिण भारत का राजनीतिक इतिहास लेखक डॉ0 अजय कुमार सिंह ।
2-भारत ज्ञानकोष
3-ऐतिहासिक स्थानावली लेखक विजेन्द्र कुमार माथुर।
4-देवगिरि के यादव लेखक राजमल वोरा
5-भारतीय इतिहास कोष लेखक सच्चिदानंद भाट्टाचार्य ।
6-दिल्ली सुल्तनत भाग 2 संपादक मोहम्मद हवीव ,खालिक अहमद निजामी ।
7-दकन का प्राचीन इतिहास संपादक जी याजदानी ।
8-सल्तनत काल में हिन्दू -प्रतिरोध लेखक अशोक कुमार सिंह ।

लेखक-डॉ0 धीरेन्द्रसिंह जादौन
गांव-लढोता ,सासनी
जनपद-हाथरस ,उत्तरप्रदेश।
एसोसिएट प्रोफेसर ,कृषि मृदा विज्ञान
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001

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