अलीगढ़ जनपद के यदुवंशी जनकवि ठाकुर खेमसिंह "नागर " नगला पदम की गौरव गाथा--

अलीगढ़ जनपदीय  स्वतंत्रता की क्रांति के एक महानायक जनकवि  ठाकुर खेमसिंह "नागर " नगला पदम् की गौरवशाली जीवन गाथा ----

खेमसिंह नागर सर्वतो मुखी प्रतिभा के धनी जन कवि थे।जन साहित्य और कला के क्षेत्र में ही नहीं , जीवन और जगत के प्रायः सभी क्षेत्रों में इन्होंने मानवता के लिए अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है।इनका व्यक्तित्व  प्रभाव शाली था।नागर जी विकास और प्रगति के दृढ़ अंकुर थे ।जीवन के प्रत्येक क्षण में नागर जी क्रियाशील एवं प्रगतिशील रहे थे ।देश के विभिन्न जिलों में इन्होंने देहातों में जाकर स्वरचित देशभक्ति से ओतप्रोत लोकगीत गाये।देहातों में नागर जी ने स्वतंत्रता की क्रांति का स्वर किसानों ,गरीवों एवं मज़दूरों तक में भी फूंक दिया।नागर जी के गीतों का नेताओं की सभाओं और भाषणों की अपेक्षा अधिक प्रभाव पड़ रहा था।नागर जी के गीत लोकगीतों के क्षेत्र में अभूतपूर्व थे।श्रीकृष्ण एवं राधिका जी के जीवन से सम्बंधित गीत लिखे।इन्होंने इन गीतों के भाव और स्वरूप को परिवर्तित किया उनको नया रूप ,नई वाणी दी तथा नई वाणी में नव जाग्रति का संदेश जन -जन तक पहुंचाया।
अलीगढ़ के स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर टोडर सिंह जैसे मित्रों के सानिध्य में रह कर नागर जी की सरदार भगतसिंह जी जैसे महान क्रांतिकारियों से  भी भेंट हुई ।उनकी राष्ट्रवाद की क्रान्तिकारी विचारधाराओं का नागर जी ह्रदय पर गहरा प्रभाव पड़ा और स्वतंत्रता के लिए जन-आंदोलनों में भाग लेने लगे तथा देशभक्ति का लोगों में जज्बा पैदा करने के लिए अपनी देशभक्ति की गोरों के खिलाफ कविता लिखने लगे।
नागर जी प्रयास करने पर भी बहुत अधिक पढ़ नहीं पाए किन्तु राजनैतिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों में इन्होंने विशेष उपलब्धियां प्राप्त की।अपने पिता के साथ नागर जी बहुधा ऐसे ही निर्भीकतापूर्वक ज्ञान -चर्चा किया करते थे ।इन आध्यात्मिक संस्पर्श ने ही इन्हें दीन-दुखियों के प्रति स्नेह और सहानभूति से भर दिया जिसका वर्णन इन्होंने अपनी कविताओं में भी खूब किया था।
नागर जी बहुत अच्छे मण्डली गायक भी थे।आप ने एक गायक-मण्डली का भी गठन किया था।किसान आन्दोलन के सम्बन्ध में तथा आस-पास के जन आंदोलनों में अलीगढ़ के खेमसिंह" नागर" ,पंडित छेदालाल" मूढ़ " , किशनलाल भारद्वाज तथा साहबसिंह मेहरा जैसे लोक कवियों और गायकों  ने ब्रज क्षेत्र के लोगों में अपने ब्रजभाषा के सामूहिक लोकगीतों द्वारा क्षेत्रीय जनता एवं श्रोताओं के ह्रदय में आजादी का अलख जगाया। ये कवि होने के  साथ -साथ जिला किसान सभा के नेता और कार्यकर्ता भी थे।

नागर जी  थे किसान कवि के रूप में विख्यात---

खेमसिंह नागर जी की किसान कविता की लोकप्रियता का प्रमाण नेहरू -नागर घटना से दिया जा सकता है। किसान कवि 'खेम सिंह नागर' की कविता सुनने के लिए 1936 में किसानों ने जवाहरलाल नेहरूजी के भाषण का बहिष्कार कर दिया । वह कविता थी

“ओ मजदूर किसान 
बदल दो दुनिया ।
जग के खेवनदार 
बदल दो दुनिया । "
नेहरू की लोकप्रियता ब्रज के किसानों में लोक कवि 'खेम सिंह नागर' से कम होने के कारण किसान की माँग पहले हुई । इसलिए कहा है कि किसान की मानवीय संवेदना ही किसान कविता है। आज किसान मुक्त हो गया तो समझो 'किसान कविता' भी मुक्त हो गयी । किसान कविता मुक्ति का मतलब है-"किसान वर्ग की  संवेदना, अनुभव, बोध और सौंदर्यबोध की मुक्ति पाना।”

जब भी अलीगढ़ जनपद के लोक कवियों एवं गायकों की कभी भी चर्चा होगी तब -तब इन महान विभूतियों का स्मरण श्रद्धा एवं सम्मान के साथ जरूर किया जाएगा।ऐसा मेरा मानना है।

पारिवारिक प्रष्ठभूमि--

ठाकुर खेमसिंहनागर  (नागर साहित्यिक उपनाम) का जन्म-दिसम्बर, 1898 ई० में 
चंडौस क्षेत्र के नगला पदम, जिला-अलीगढ़ (उ. प्र.) में जादों राजपूत परिवार में हुआ था।
आप के पिता श्री बिहारीसिंह   एक धर्मजीवी किसान, अशिक्षित किन्तु प्रायः कवि एवं लोक-गायक थे। माता का नाम गौरादेवी था जो गभाना क्षेत्र के घौरोट गांव की थी। पत्नी- भूगोदेवी , पुत्र प्रेम कुमार तथा पुत्रियाँ-कलावती, लीलावती, प्रेमवती, शान्ति, सत्यवती । छोटे भाई रामप्रसाद सिंह और कमल सिंह थे।

शिक्षा एवं वैवाहिक जीवन  --

नागर जी ने प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं की थी। कक्षा 3 तक ही पढ़ाई हुई।गांव के स्कूल से इनका नाम भी कट गया।इनकी पढ़ाई बन्द हो गई।ननिहाल  घौरोट चले गए वहां पर भी पढ़ाई नहीं हो सकी।वहां कोई पढ़ा -लिखा नहीं था।पत्र पढ़वाने के लिए वहां के लोग निकट के गांव बीरपुरा जाते थे।ननिहाल में भी लाड़-प्यार के कारण नागर जी की पढ़ाई नहीं हो पाई।जनता के विश्वविद्यालयों से उच्च ज्ञान और संभवता प्राप्त की ।
     पिता की आज्ञा मानकर नागर जी को बाल -विवाह करना पड़ा।मात्र 11 वर्ष की उम्र में ही इनका विवाह हो गया था। इनकी पहली पत्नी नन्ही देवी का विवाह के दो साल बाद देहान्त हो गया।पत्नी की मृत्यु के तीन साल बाद स्वर्गीया की छोटी बहिन भूपोदेवी से विवाह हुआ।

सम्पूर्ण परिवार स्वतंत्रता प्रेमी --

नागर जी के इकलौते पुत्र प्रेमकुमार ने स्वाधीनता आन्दोलन मे  भाग लिया और जेल काटी। कहा जाता है कि नागर जी की पत्नी भी जेल में रहीं और उनके बेटे प्रेमकुमार का जन्म भी जेल में ही हुआ था।नागर जी के छोटे भाई कमलसिंह भी उन्हीं की प्रेरणा से स्वाधीनता के लिए जेल गये।



जीवन संघर्ष---

1914- आर्य समाज के प्रभाव में आर्य समाजी प्रचारक महाशय जसवंतसिंह और महाशय छज्जासिह की गायन मंडली में शामिल ।1916 में भारतीय कांग्रेस के सदस्य बने ।1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह में ठाकुर टोडर सिंह के नेतृत्व में 14 सत्याग्रहियों  के जत्थे में शामिल नागपुर जेल में 14 महीने की बामशक्त  कैद हुई।
1924 जनपद के प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता ठाकूर टोडर सिंह के साथ क्रांतिकारी  गतिविधियों में दिलचस्पी। सरदार भगत सिंह जी  से अलीगढ़ में मुलकात । 1931 आर्य समाज के विधिवत् सदस्य रहे।बीस रुपये के मासिक योगक्षेम पर आर्य समाज के पूर्णकालिक कार्यकर्ता । 1931 में हैदराबाद रियासत में 'सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिबन्ध और बन्दे मातरम् गीत पर पाबन्दी के विरोध में हैदराबाद जाकर गिरफ्तारी देना और जेल यात्रा ।1936 में कांग्रेस से नागर जी का मोहभंग हो गया । नागर जी बराबर सत्य की खोज कर रहे थे ।इसी कारण बराबर पार्टियां बदल-बदल कर सत्य का अन्वेषण करते रहे ।उसी समय सोशलिस्ट पार्टी के लोगों ने नागर जी से उनकी पार्टी की सदस्य बनने का आग्रह किया। सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण की।इसके बाद 1942  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता जीवन पर्यन्त इसी पार्टी में रहे। पार्टी द्वारा संचालित सभी कार्यक्रमों में सक्रिय भागेदारी। अनेको जेल यात्राएँ, धरना प्रदर्शन, सत्याग्रह और अनशन आदि में अग्रणीय भूमिका में आप रहे ।
 
जेल यात्राएँ- 

नागर जी कई बार जेल की यात्राएं की सन 1923, 1930, 1931, 1932, 1940, 1942 से 1946। लगभग दस साल जेल में रहे। सन 1945 में नागर जी आजादी के पक्ष में भाषण दे रहे थे उसी समय इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में इन्हें नागपुर ,वनारस ,आगरा की सेंट्रल जेलों में रख कर यातनाएं दी गयीं ।

निधन--
30 अक्टूबर सन 1988 को 90 वर्ष की आयु में नागर जी का निधन  हो गया। नागर जी बहुत सुडौल शरीर वाले व्यक्तित्व के धनी थे।खादी का कुर्ता -धोती एवं जाकट पहनते थे।उनका  रहन -सहन सदा जीवन एवं उच्च विचार वाला था।अंतिम समय तक स्वस्थ रहे तथा देशभक्ति ,समाजसुधार ,गरीब मजदूरों के विषय में ब्रजभाषा में अपनी रचनाएं लिखते रहे।

साहित्यिक- सृजन

राजनैतिक आन्दोलनों और गिरफ्तारियों की बजह से खेमसिंह नागर जी को साहित्यक -सर्जन का अधिक समय नहीं मिला ।इनकी अधिकतर रचनाएं जेलों में लिखी गयी ।किसान बारहमासी इनकी प्रसिद्ध रचना है।लखनऊ साथी प्रेस से प्रकाशित और प्रसिद्ध क्रान्तिकारी लेखक श्री यशपाल जी द्वारा सम्पादित "विप्लव "और वनारस से प्रकाशित "हंस " एवं "स्वतंत्र भारत " , "तारा , जनयुग"  (दिल्ली ) में बराबर नागर जी की रचनाएं प्रकाशित होती थी।

नागर जी ने 1914 में लोकगीत लिखना शुरू किया।आप ने  समाज सुधार, अछूतोद्धार और स्वदेशी के प्रचार में आर्य समाजी दृष्टिकोण से रचनाएँ की।
- 1914 से 1930 तक कई जिकड़ी भजन लिखे।
-अपने गीत, धरती के गीत (रसिया एवं होली-ग्रह) - 1940
-नल दमयन्ती (नाटक) - 1940
- शिवाजी और रोशन आरा (नाटक) - 1940
- कर्तव्य (नाटक) - 1940
- फांसी का सुहाग (नाटक) - 1940
- किसान की तकदीर (भजन - रागनी ) - 1942
-भीम प्रमिज्ञा (पौराणिक नाटक) - 1945
- मजदूरन रधिया (नाटक) - 1948 
-जन कीर्तन- 1952
- नये रसिया-1952
-किसान बारहमासी-1952
 - क्रान्ति बाटिका-1953
-सरदार भगतसिंह (नाटक) - 1957
-झांसी की रानी सांगीत नौटंकी-1959
- दहेज प्रथा (नाटक) - 1960
-अब्दुल हमीद (नाटक) - 1965
- राखी की लाज (संगीत नाटिक) - 1976
-बंटवारा (संगीत नाटिका) - 1979
- पंत नगर संग्राम (आल्हा) - 1979
— अनेको रसिया, होली, मल्हार, ढोला, आल्हा, रागनी, भजन,कीर्तन, बारहमासी, जिकड़ी भजन, गजल, कब्बाली, दादरा, सुपरी माचिंग गीत, फिल्मी पैराडी आदि लिखे और गाये ।आप की अधिकांश रचनाएँ अप्रकाशित हैं।

विशेष ज्ञातव्य ---

नागर जी और उनके अनन्य सहयोगी और मित्र पंडित छेदालाल "मूढ़ " की जोड़ी समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लीजेंड बन गई थी।"मूढ़ " जी अद्वितीय गायक थे।
  नागर जी एवं पंडित छेदालाल " मूढ़ " दोनों  ने अनेक शहरों की सांस्कृतिक यात्राएँ की थीं। खेतान सेठ के निमंत्रण पर बम्बई में एक महीने तक रहे थे। नागर जी 'इप्टा' से सम्बद्ध थे। उनके नाटकों की अनेकों प्रस्तुतियां इप्टा द्वारा की गई ।आप ने सोवियत संघ की यात्रा की तथा मास्को रेडियो से उनकी रचनाएँ  भी प्रसारित हुई ।सी.पी.आई. के महासचिव का० पूरनचन्द्र जोशी उनके गाँव आकर उनकी रचनाओं को रिकार्ड करके ले गये थे ।  प्रगतिशील लेखक संघ के भिवंडी सम्मेलन में नागर-मूढ के लोक गीतों की धूम मच गई थी।
नागर जी की रचनाएँ-हंस (इलाहाबाद), स्वतन्त्र भारत, विप्लव (लखनऊ), तारा, जनयुग (दिल्ली) में भी प्रकाशित हुई।
माँ भारती सदैव अपनी कोख से ऐसे लालों को जन्म देती रही है जिनके त्याग और आदर्शों के सहारे समग्र मानवता का कल्याण होता रहा है ।नागर जी भी उन्नीसवीं सदी में जन्मे एक ऐसे ही माँ भारती के वरद पुत्रों में से एक थे।

मैं उनकी पुण्य आत्मा को अपने इस लेख के माध्यम से सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
     इस लेख को लिखने की प्रेरणा मुझे मेरे परम् सम्माननीय गुरुदेव प्रोफेसर डा0 ऋषिपाल सिंह जी से मिली ।नागर जी का गुरुदेव के घर पर आना -जाना होता था।लेख को पूर्ण करने में मुझे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से सेवा -निवृत्त प्रोफेसर डा0 भरत सिंह जी का काफी सहयोग मिला ।आप दोनों का मैं तहे दिल से आभार व्यक्त करते हुए सादर प्रणाम करता हूँ।
        । जय हिन्द ।

सन्दर्भ-
1-अलीगढ़ जनपद के जनकवि -खेमसिंह नागर लेखक डा0 रवेन्द्रपाल सिंह ।
2-क्रान्तिकारी लोक कवि -खेमसिंह नागर लेखक डा0 भरतसिंह ।

लेखक-डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव -लढोता , तहसील -सासनी  
जनपद- हाथरस, उत्तर प्रदेश ।
एसोसिएट प्रोफेसर कृषि मृदा विज्ञान 
शहीद कैप्टन रिपुदमन सिंह राजकीय महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ।

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