यदुवंशी जादों राजपूतों के दुर्ग /किलों का ऐतिहासिक शोध--
यदुवंशी जादों राजपूतों के दुर्ग /किलों का ऐतिहासिक शोध ---
1-महावन दुर्ग ----
मध्यकाल में महावन यदुवंशी राजा कुलचन्द्र की राजधानी था ।वश बहुत शक्तिशाली शासक था ।
अलउत्वी के वर्णन को ग्राउस ने इस प्रकार उदवृत किया है --" राजा कुलचन्द का दुर्ग महावन में था।उसको अपनी शक्ति पर पूरा भरोसा था क्यों कि तब तक कोई भी शत्रु उससे पराजित हुए बिना नहीं रहा था।वह ऐसे विस्तृत राज्य , अपार वैभव ,अगणित वीरों की सेना , विशाल हाथी और सुदृण दुर्गों का स्वामी था ,जिसकी ओर किसी को आंख उठा कर देखने का भी साहस नहीं होता था।जब उसे ज्ञात हुआ कि महमूद उस पर आक्रमण करने के लिए आरहा है ,तब वह अपने सैनिक और हाथियों के साथ उसका मुकाबला करने को तैयार हो गया ।अत्यंत साहस एवं वीरतापूर्वक युद्ध करने पर भी जब महमूद के आक्रमण को विफल नहीं किया जसका , तब उसने अपने सैनिक गढ़ से निकल कर भागने लगे ,ताकि वे यमुना नदी को पार कर अपनी जान बचा सकें ।इस प्रकार प्रायः 50,000सैनिक उस युद्ध में मारे गये , अथवा यमुना में डूब गए।तब कुलचन्द ने हताश होकर पहले अपनी पत्नी को और फिर स्वय अपने आप को भी तलवार से समाप्त कर दिया , लेकिन यवनों के हाथों मृत्यु को स्वीकार नहीं किया ।उस अभियान में महमूद को लूट के अन्य सामान के अतिरिक्त 185 विशालकाय सुन्दर हाथी भी प्राप्त हुए थे ।
फरिस्ता ने भी उस युद्ध का उत्वी से मिलता हुआ वर्णन किया है।
2-बयाना / विजयमन्दिरगढ़ दुर्ग---
बयाना - यह भरतपुर से 7 मील दक्षिण पश्चिम में स्थित है। इसके प्राचीन नाम शांतिपुर, श्रीपथा व विजयमन्दिर गढ़ थे। विजयपाल ने 11वीं शताब्दी में यहां एक दुर्ग बनवाया था तब इसका नाम विजयमंदिर गढ़ दिया था । बारहवीं शताब्दी मे यह बयाना कहलाने लगा । बाद में कुछ समय के लिए यह सुल्तानपुर के नाम से भी पुकारा जाने लगा। मध्ययुगीन शिलालेखों में इसको ब्रह्म बाग के नाम से भी उल्लेख किया गया है। ईसवीं सन् 955 में यहां के शासक मंगलराज की रानी चित्रलेखा ने यहां विष्णु का मंदिर बनवाया था। यहां जैन धर्म का भी काफी प्रचार था तथा उस समय की कई जैन मूर्तियां मिलती है। 14वीं शताब्दी में यहां मुसलमानों का शासन होने पर यहां कई मस्जिदें हिन्दू मंदिरों को तोड़कर बनवाई गई ।
3-तिमनगढ़/ ताहनगढ दुर्ग ---
यह दुर्ग बयाना से 15 मील दक्षिण में है। इस किले को तिमनपाल यदुवंशी ने ग्यारहवीं सदी में बनवाया था और उसी गढ़ के आस-पास की बस्ती तहनगढ़ कहलाने लगी। यह गढ़ मध्ययुग में बड़ा सामरिक महत्व रखता था। अतः
मुसलमानों के आक्रमण बराबर होते रहते थे और इसी कारण यह नगर शीघ्र उजड गया।यह दुर्ग पाषाण की मूर्तियों के अमिट खजाने एवं हस्तशिल्प के बेजोड़ नमूनों के लिए ख्याति प्राप्त था । यहां कई जैन व शैव मन्दिर थे लेकिन मुस्लिम आक्रमणों के कारण अब केवल खण्डर रह गये हैं। यह स्थान करौली से 42 किलोमीटर दूर मासलपुर के पास स्थित है।
4-मण्डरायल दुर्ग---
करौली से दक्षिण मे 40 किलोमीटर दूर चम्बल नदी के निकट मण्डरायल कस्वा है जिसकी ऊँची अरावली पहाड़ियों में मंडरायल का दुर्ग बना हुआ है जो करौली की स्थापना से पूर्व का है।
इस किले का निर्माण संवत 1184 के लगभग बयाना के यदुवंशी शासक विजयपाल के पुत्र मदनपाल ने कराया था।कुछ किवदन्तियों के अनुसार माण्डव ऋषि के नाम इस दुर्ग का नामकरण होना मानते हैं ।माना जाता है कि जब यदुवंशी इस क्षेत्र में आये थे तब भी यह दुर्ग मौजूद था।मंडरायल दुर्ग को ग्वालियर दुर्ग की कुंजी कहा जाता है ।यह दुर्ग लाल पत्थरों से बना हुआ है।
मध्यकाल मे सामरिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण किला था। दिल्ली सल्तनत का अधिकार इस किले पर लम्बे समय तक रहा है। यदुवंशी नरेश अर्जुन देव द्वारा करौली की स्थापना से पूर्व इस किले पर अधिकार किया, साथ ही नींदर गाँव मे एक गढी का निर्माण भी किया था। 1504 ईस्वी मे सिकन्दर लोदी ने इस किले पर अधिकार कर लिया तथा इसमें स्थित मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनवाई ।सिकन्दर लोदी ने यहां स्थित विशाल उद्यान भी नष्ट करदिया ।1534 ईस्वी में गुजरात के शाह बहादुरशाह के सेनापति तातार खां ने इस दुर्ग को अधिकृत कर लिया। इस बाद हुमाँयू की सेना ने तातार खों से इस किले को छीन लिया।महाराजा गोपालदास ने इसे मुसलमानों से छीनकर करौली राज्य में सम्मलित किया।उसके बाद यह दुर्ग करौली राज्य में ही बना रहा ।वर्तमान में यह दुर्ग खण्डहर प्रायः हो चुका है।चम्बल नदी यहां से 5 किमी0 की दूरी पर बहती है। करौली के राजा हरवख्स पाल के शासनकाल में 1820 ईस्वी के आसपास इस दुर्ग के अंदर वाल किला बनवाया।
इसके बाद यह किला निरन्तर करौली नरेशों के अधीन रहा। किले से लगभग 1 किलोमीटर पश्चिम में गैवरदान की गुफा तथा एक कब्र के अवशेष उपलब्ध है जहाँ ग्रामीण सर्प काटने तथा अन्य मनोतिया पूरी करने के लिए पहुंचते है।
5- बहादुरपुर किला---
जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर मंडरायल मार्ग पर वन क्षेत्र मे बहादुरपुर किला अपने अतीत का शाक्षी बनकर खण्डहर स्थिति में खड़ा हुआ है। मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों और सुरक्षा सैनिकों के लिए प्रकोष्ठ बने हुए है। साथ ही चारों ओर सुदृण परकोटा है। दरवाजे के अंदर उत्तर की ओर एक बावडी तथा कुआ है। किले के ये ही प्रमुख जल स्रोत थे।दरवाजे पर 1589 ईस्वी का एक शिलालेख है। अभिलेख में गोपालपुर लिखा होने से लगता है कि इस किले का निर्माण राजा गोपालदास द्वारा कराया गया हो। किले के नीचे एक नदी बहती है।
उतगिरि के बाद करौली की राजधानी बहादुरपुर बनी जहाँ राजा गोपालदास का शासन था। आमेर की राजकुमारी रस कंवर से इनका विवाह हुआ था। सम्राट अकबर का दौलताबाद विजय में सहयोग करने पर इन्हें अजमेर का सूबेदार बनाया गया था। आगरे के लाल किले की नीव भी 1506ई0 में अकबर द्वारा इसी राजा से रखवाई गई थी । गोपालदास के बाद द्वारिकादास , मुकुंददास एवं छत्रमणी ने यहीं से करौली राज्य का शासन संचालित किया ।किले में द्वारका दास के एक अन्य पुत्र मगधराय का स्मारक बना हुआ है जहाँ लोग मनोतियाँ मांगने जाते हैं।
(6) ऊँटगिर दुर्ग --
यह दुर्ग घने जंगल के भीतरी भाग में रणथम्भौर अभ्यारण क्षेत्र में स्थित है। करणपुर के पश्चिम में कल्याणपुरा के पास यह किला तीनों ओर से पहाड़ियों से घिरा है ।किले के नीचे अनेक पुरानी छतरियां बनी हुई हैं। इस दुर्ग का निर्माण लोधी जाति के लोगों ने कराया था ।उन्होंने ही समय -समय पर यहां तालाब और बांध बनवाये ।महाराजा अर्जुनपाल ने सम्बत 1397 में इस दुर्ग को लोधियों को खदेड़ कर हस्तगत किया था।
करौली से 40 किमी पश्चिम में करनपुर के पास पर्वत श्रृंखला की सुरंगनुमा पहाडी पर स्थित है। पहाड़ी की आकृति ऊँट जैसी होने के कारण संभवतया इसका नाम उंटगिर पड़ा हो ।राजा प्रतापरुद्र ने उंटगिर को अपनी राजधानी बनाया।बाद में 15 वीं सदी में राजा चन्द्रसेन इस दुर्ग में रहे थे।
(7) देवगिरि दुर्ग --
इस किले का निर्माण महाराजा देव बहादुर गोपालदास के समय हुए होने के आधार पर इसका नाम देवगिरि रखा गया।यह दुर्ग उंटगिर के शासकों का आवास था।लोग देवगिरि में रहते थे।यह किला रणथम्भौर अभ्यारण्य क्षेत्र में उंटगिरि के पूर्व में चम्बल के किनारे ऊँचाई पर स्थित है। किले का अधिकांश भाग खण्डहर होते हुऐ भी अतीत की घटनाओं का साक्षी है।
(8)-कुँवरगढ़ किला-
राजाधर्मपाल के पुत्र कुँवरपाल ने चम्बल नदी के किनारे झिरी के पास गौलारी में संवत 1153 ,ईसवी सन 1096 में एक किला वनबाया था जो कुँवरगढ़ के नाम से जाना गया।
(9) फतेहपुर किला--
इस किले का निर्माण हरनगर के ठाकुर
घासीराम ने सन 1702 ई0 में कराया था।
करौली से 30 किमी दूर कंचनपुर मार्ग पर 250 वर्ष पूर्व निर्मित यह किला यदुवंशियों की 16 शाखाओं का मुख्यालय था। क़िले के अन्दर आवासीय भवनों के अलावा पानी के टाँके एवं हनुमान जी का मन्दिर है।
(10) किला नारौली डांग-- -
सपोटरा के नारौली गांव में ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। इस किले का निर्माण सन 1783 ई0 में करौली के यदुवंशी मुकुन्दपाल के वंशजों ने कराया था। राजा भंवरपाल जी ने किले के चारों ओर परकोटा एवं कचहरी का निर्माण कराया था ।
(11) रामठरा किला --यह दुर्ग करौली क्षेत्र के सपोटरा उपखण्ड में स्थित है।
इस किले का निर्माण करौली के यादवों ने कराया था।सन 1645 में इस किले का करौली महाराजा ने अपने पुत्र भोजपाल को जागीरदार बना कर इस किले का अधिकारी बनाया था । इस किले के जागीरदार भोजपाल थे ।यह किला कैलादेवी अभ्यारण्य से 15 किमी दूरी पर है। इसकी दिवारों व छतों पर आकर्षक चित्रकारी की गई है। यहां पर्यटकों के ठहरने की भी व्यवस्था है। दुर्ग के पास एक शिवजी का मन्दिर है जिसका निर्माण रामठरा के जागीरदार आनन्द पाल जी की पुत्री जो जयपुर के महाराजा सवाई ईश्वरी सिंह को ब्याही थी उन्होंने अपने भाई अर्जुनपाल जी रामठरा को पत्र लिख कर रामठरा में अपनी तरफ से एक मन्दिर वनबाने का आग्रह किया था जो अर्जुनपाल जी ने स्वीकार कर लिया ।यह वही शिवालय मन्दिर है ।यह मन्दिर संवत 1743 में बना हुआ है जिसके निर्माण के लिए पैसा एवं कारीगर जयपूर से जादौन जी ने अपने जीते जी भेजे थे।
(12)सपोटरा दुर्ग--
सपोटरा दुर्ग करौली के महाराजा धर्मपाल के वंशज राव उदयपाल ने बनवाया था जो महाराजा रतनपल के पुत्र थे।राव उदयपाल को सपोटरा ठिकाना दिया गया था तथा उनके भाई कुंवरपाल करौली के सन 1688 में राजा बने थे।ये दुर्ग जीरौता से 11किमी पूर्व में है।इसमें एक खूबसूरत तालाब भी बना हुआ था।अब दुर्ग जीर्ण-शीर्ण स्थित में है ।
(13)थाली दुर्ग -
यह दुर्ग मचीलपुर से उत्तर-पश्चिम में एक पहाड़ी पर स्थित है। इस दुर्ग का निर्माण
महाराजा हरबख्श पाल ने कराया था। इस दुर्ग में अन्दर एक कुंआ है जिससे जलापूर्ति की जाती भी ।
(14) कुर्रा दुर्ग --
मचीलपुर से 3 किमी. पूर्व में यह दुर्ग स्थित है। यह किला महाराजा गोपालदास ने बनवाया था। दुर्ग के पास एक नाला बहता है जिस पर आम के बाग थे। दुर्ग के अन्दर एक गहरा पूल है।
(15 )मांची दुर्ग--
यह दुर्ग मांची गांव में था। यह हरिदास ठाकुर के वंशजों की रियासत थी। यहां पर एक दुर्ग था जो महाराजा प्रतापपाल द्वारा तोड़ कर ध्वस्त किया गया था क्यों कि मांची ठाकुर उनके समय में विद्रोही थे।
(16)अमरगढ़ दुर्ग--
यह करौली रियासत का सशक्त ठिकाना रहा । यहाँ का पहला ठाकुर राजा जगमन का बेटा अमरमान था। इसी ने इस गिरि दुर्ग का निर्माण कराया और दुर्ग के नीचे आबादी विकसित कराई। यहाँ के ठाकुरों का आमतौर पर अपने शासकों से मतभेद रहा करता था। महाराजा मानिक पाल (1722-1804 ई) के शासन में कुँवर अमोलक पाल ने सन् 1802 ई0 में यह किला उमरगढ़ के ठाकुरों से छीन लिया। इसी प्रकार महाराजा हरबक्स पाल (1804-1837 ई) ने भी अपने समय में इस गढ़ को एक बार हस्तगत कर लिया था।
महाराणा प्रताप्रपाल (1837-40 ई) ने यहाँ के ठाकुर लक्ष्मणपाल को विरोधियों की मदद करने के इल्जाम में (सन् 1947 ई) पन्द्रह हजार रूपयों से दंडित किया। यह गढ़ आज भी सुरक्षित है जिसमे ठाकुरों के वंशज रहते हैं। इस दुर्ग से कुछ ही दूरी पर क्षेत्र की प्रसिद्ध गुफा घण्टेश्वर है, जो वन्यजीवों के साथ अपनी प्राकृतिक सम्पदा से अकूत है।"
अमरगढ़ दुर्ग में पानी के संग्रहण हेतु एक ताल भी था।
(17) बाजना दुर्ग -
बाजना में भी एक किला था जो अब खण्डहर अवस्था में है।
(18) जम्बुरा दुर्ग--
यह दुर्ग मचीलपुर परगने के पूर्वी इलाके में लगभग 3 मील दूरी पर था।
(19) निन्दा किला -यह किला मंडरायल के उत्तर में 3 मील दूरी पर स्थित था अब खण्डहर है।
(20)उन्ड का किला-
यह किला मंडरायल के उत्तरी-पूर्वी भाग में चम्बल के पास स्थित था।
(21)खुर्दयी का किला--
यह किला मंडरायल के पास स्थित है।
(22) दौलतपुरा का किला --
उंटगिरी के पास 14 मील पश्चिमी क्षेत्र में है।
23-बिजयपुर दुर्ग----
अब यह दुर्ग श्योपुर जनपद के अंतर्गत बिजयपुर तहसील में है ।विजयपुर में 16 - 17 वीं शताब्दी का बना हुआ एक किला है, जिसका निर्माण करौली के जादौ राजा गोपाल सिंह द्वारा कराया गया था। यह किला क्वारी नदी के उत्तरी तट पर एक ऊँचे टीले पर बना है। इसकी दीवार 3300 फुट लंबी हैं। नदी तट से ऊँचाई लगभग 100 फुट है। किले में पहुँचने के लिए दक्षिण की ओर से तीन दरवाजे पार करने पड़ते हैं।
किले के पूर्व-पश्चिम और दक्षिण में 50 फीट चौड़ी और 20 फीट गहरी खाई बनी है। नदी की ओर से किले की सुन्दरता रोचक है। नदी के किनारे पक्के घाट और दो बुर्ज बने हैं। किले के अन्दर दो मंजिला महल है। ऊपरी मंजिल स्थापित की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मध्यकालीन राजपूतों के महलों की तरह यह महल भी ईंट और चूने से बना है। किले के अन्दर शिव जी की छत्री, मदनमोहन जी का मंदिर, शैय्यद अली की दरगाह आदि बने हैं। यह किला युद्ध कौशल की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
अठारहवीं शती के आरंभिक वर्षों यह किला नरवर शिवपुरी के कछवाहा राजा के मंत्री, सेनापति वीरवर खांडेराव के अधिपत्य में रहा। जयपुर नरेश के आमंत्रण पर जब खांडेराव जयपुर गए थे। इसी समय पहाड़गढ़ के सिकरवार राजा दलेल सिंह ने संवत 1791 में विजयपुर का घेरा डाल दिया। "खांडेराव रासो' के अनुसार
सत्रह सो इक्यानवे, चैत्र शुक्ला रविवारं, घेरो नग्र रिसाइ, चाइ संका नहीं आनं।
खांडेराव की अनुपस्थिति में उनके पुत्र नवल सिंह किले के फाटक बंद करवा अक्रांत सेना पर गोलावारी प्रारम्भ कर दी, यह घेरा आठ दिन तक चला। तभी खांडेराव के दूसरे पुत्र सुरति राम शाहाबाद से पाँच हजार सैनिक लेकर आ पहुँचे। सुरतिराम ने पहाड़गढ़ की सेना पर पीछे से आक्रमण कर दिया। दलेल सिंह का साहस टूट गया उनके पैर उखड़ गए और भाग खड़े हुए। बाद में यह किला मराठा शासक सिंधिया के अधीन रहा जिन्होंने यहाँ अपना परगना स्थापित किया।
23-सबलगढ़ किला---
सबलगढ दुर्ग का निर्माण करौली के राजा गोपालसिंह द्वारा कराया गया। सन् 1752 ई. में इन्होंने सबलगढ़ विजयपुर जीत कर राज्य का विस्तार किया। गोपाल सिंह के समय राज्य की सीमायें क्वारी नदी के पार कर गई सबलगढ़ नगर के परकोटे का निर्माण भी इन्हीं के द्वारा कराया गया है।
सन् 1750 ई. में यूरोपियन यात्री ट्रीफन थ्रेलर यहाँ होकर गुजरा। उसने अपने यात्रा वृतांत में "सबलगढ़ किले को एक मजबूत किला" होने का उल्लेख किया है। सन् 1795 में यह किला मराठाओं ने करौली के जादों राजपूतों से छीन लिया और मराठा सरदार खाण्डेराव को यहाँ का प्रशासक नियुक्त किया। सन् 1809 में "जॉन वैपेटिस्ट द्व इसे अपने अधिपत्य में ले लिया गया किन्तु कुछ समय पश्चात इसे मराठाओं को फिर वापस कर दिया गया।
सबलगढ़ किला सबलगढ़ नगर में मुरैना से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर है। मध्यकाल में बना यह किला एक पहाड़ी के शिखर पर बना हुआ है। इस किले की नींव सबल सिंह ने डाली थी। करौली के महाराजा गोपाल सिंह ने 18वीं शताब्दी में इसे पूरा करवाया था। कुछ समय बाद सिंकदर लोदी ने इस किले को अपने नियंत्रण में ले लिया था लेकिन बाद में करौली के राजा ने मराठों की मदद से इस पर पुन: अधिकार कर लिया ।
इस किले का निर्माण जमीनी सतह से लगभग 50 मीटर ऊँची पहाड़ी पर किया गया है। किला परिषर में जाने के लिये चार प्रमुख प्रवेश द्वार हैं। बुर्जों पर आधारित परकोटा से किला सुसज्जित है। किले • हवेली राजपूत स्थापत्य शैली की है। किले के पीछे सिंधिया शासन काल में बना एक बांध है। बलुआ पत्थर के भीतर नवल सिंह की हवेली, नवल सिंह की कचहरी, घुड़साल आदि स्मारिक हैं। जिसमें नवल सिंह की से निर्मित यह सबलगढ़ का किला अत्यंत सुन्दर एवं मनमोहक है।
24-जवाहरगढ़ दुर्ग---
जवाहरगढ़, सबलगढ़ से 20 कि.मी. दूर विजयपुर रोड़ पर स्थित है। यहां एक पहाड़ी पर किला बना हुआ है। इस किले का निर्माण 17-18 वीं शती ई. में करौली के राजा गोपाल सिंह द्वारा कराया गया था।
इस किले में प्रवेश के चार द्वार है किले में निर्मित कक्षों की दीवारों के अब अवशेष ही शेष बचे है, छतें गिर गई है। किलें के प्रांगण में एक कुआं निर्मित है जिसमें वर्षभर पानी रहता है। किले की पहाड़ी के नीचे नवीन मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर के गर्भग्रह में बीजासन देवी की प्रतिमा विराजमान है। इसी पहाड़ी के नीचे चार स्तंभो पर आधार छन्त्री का निर्माण किया गया है। जिसे जागीरदार की छत्री कहा जाता है। छत्री के समीप ही एक पुरानी इमारत है जिसे स्थानीय लोग कचहरी के रूप में जानते है।
25-पालपुर जागीर और पालपुर गढ़ी
पालपुर के जागीरदार करौली के जादौन राजाओं के वंशज हैं। "हिस्ट्र जागीरदारान" ग्वालियर स्टेट में "हालत-किशोर सिंह, जागीरदार पालपुर परगना पोहरी जिला नरवर" में उल्लेख किया गया है कि- "इस खानदान के ठाकुर चंद्रवंशी जादौन राजा करौली के रिश्तेदार हैं।" सन् 1660 ई. में बली बहादुर पालपुर पर के काबिज हुए। इनके बाद नारायण सिंह, बरजोर सिंह, तेजलसिंह हुए। सन् 1794 में ठाकुर जबान सिंह इस खानदान के जागीरदार थे। यह मुल्क राजा करौली से फतह किया, चूँकि जवान सिंह दरबार की तरफ से शामिल हुए इसलिए इनकी साविक जागीर बदस्तूर छोड़ी गई ।
सन् 1825 ई. में बलभद्र सिंह को पट्टा हुआ। इसके बाद शिवरतन गद्दीनसीन हुए। शिवरतन की में मृत्यु होने के बाद उनके बड़े पुत्र माधौसिंह को गद्दी मिली तथा माधौसिंह की मृत्यु होने के बाद उनके छोटे भाई किशोर सिंह जागीरदार हुए। किशोर सिंह के बाद श्री जगमोहन सिंह जी यहाँ के अंतिम जागीरदार रहे। वर्तमान में इस घराने में श्री पुष्पराज सिंह, श्री कृष्णराज सिंह, श्री विक्रम राज सिंह मौजूद हैं तथा ग्वालियर में निवासरत हैं।
पालपुर किले का निर्माण संभवतः करौली के राजा गोपाल सिंह द्वारा कराया गया था इस किले प्राकृतिक सुरक्षा कूनो नदी से प्राप्त है। इसके बाद सुरक्षार्थ एक ऊँची प्राचीर है। जिसमें बुर्ज बने हुए हैं। किले के दो प्रवेश द्वार हैं। यह किला दो मंजिला है। किले के अन्दर एक आयताकार भवन ऊंचे प्लेटफॉर्म पर बना हुआ है। इसमें नक्काशीदार सजावट की गई है। यह रामजानकी मंदिर है। यह इस ठिकानेदारों का पूजा घर है। किले के अंदिर दांयी ओर आयताकार दो मंजिला इमारत है। जिसकी अब एक ही मंजिल शेष है। यह पालपुर के शासकों का दरबार हॉल अथवा कचहरी है।
कचहरी के सामने एक बड़ा प्लेटफार्म बना है, जिस पर यहाँ के जागीरदार कचहरी लगाते समय बैठते होंगे। इस किले का निर्माण राजपूताना स्थापत्य शैली में किया गया है। पालपुर जागीर में 28 गाँव शामिल थे। इनमें से अधिकांश गाँव श्योपुर जिले के कराहल, वीरपुर, विजयपुर तहसील अंतर्गत आते हैं। इन गाँवों में बहुत से गाँव कूनो नेशनल पार्क में पार्क में आ जाने से इनका विस्थापन किया गया है। अब यह किला या गढ़ी कूनो नेशनल पार्क का हिस्सा है। यहाँ से कूनो नदी और कूनो घाटी का सौन्दर्य देखते है बनता है। यह गढ़ी अधिकांशतः खण्डर अवस्था में है, इसकी निर्माण 16वीं- 17वीं सदी में किया जान प्रतीत होता है।
26-सुमावली किला --
यह दुर्ग नूराबाद से 17 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। कहा जाता है इस दुर्ग का नाम निर्माण राजा गोपाल सिंह ने ही करवाया था।उनका एक सामन्त सोमपाल इस दुर्ग में रहते थे । सांक नदी से लेकर सबलगढ़ का क्षेत्र करौली के जादों राजपूत शासकों के अधिकार क्षेत्र में था, उन्हीं के सामन्तों का इस गढ निवास स्थान था।
19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक यह किला करौली के शासक राजा गोलपाल सिंह के आधिपत्य में रहा। इसके बाद ग्वालियर के सिंधिया रियासत के अधीन आया । विक्रम संवत् 1868 (ई. सन् 1811 ) एवं 1889 (ई. सन् 1832) में तुलसी पाण्डे और रामपाल नामक किलेदार की जानकारी प्राप्त होती है ।
यह दुर्ग सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था । सबलगढ़ के शासकों द्वारा इसका निर्माण 17-18वीं शताब्दी में करवाया था, जो अधिक समय तक करोली के शासकों के अधिपत्य में रहा। सुदृढ़ गढ़ी आकार में वर्गाकार है, जिसके कोनों पर बुर्जों की संरचना है। इसकी प्राकार भित्ति एवं बुर्ज 50 फीट ऊँचे है। गढ़ी के अंत: भाग में निवास हेतु महलों की संरचना भी रही है जो अब जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है।
27-केसरोली दुर्ग
अलवर जिले में नीमराणा दुर्ग से कुछ दूरी पर केसरोली दुर्ग स्थित है। यहाँ से महाभारत कालीन प्रमाण मिले हैं। केसरोली दुर्ग का एक द्वार पाण्डवकालीन माना जाता है। वर्तमान केसरोली दुर्ग, इस क्षेत्र के यादव शासकों द्वारा चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में बनाया गया। दुर्ग का निर्माण महाभारत काल से चले आ रहे अति प्राचीन दुर्ग के अवशेषों पर किया गया। यह दुर्ग धरती से डेढ़-दो सौ फुट ऊंची चट्टान जैसी पहाड़ी पर बना हुआ है। दुर्ग के भीतर कई महल हैं। एक विशाल कुंआ भी बना हुआ है। दुर्ग के उत्तर की ओर एक तालाब है।
फिरोजशाह तुगलक के समय में इस क्षेत्र के यादवों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसके बाद यह दुर्ग मेवाती मुसलमान खानजादों के अधीन हो गया। बाबर के आक्रमण के समय यह दुर्ग हसन खां मेवाती के अधीन था जो खानवा के मैदान में महाराणा सांगा की तरफ से लड़ता हुआ काम आया।
बाबर ने यह दुर्ग मुगल सल्तनत में सम्मिलित कर लिया। जब अठारहवीं शताब्दी में मुगल कमजोर हो गये, तब यह दुर्ग जाटों के अधीन हुआ। जब रावराजा प्रतापसिंह ने जयपुर राज्य में से अलवर राज्य का निर्माण किया तब यह यह दुर्ग अलवर राज्य के कच्छवाहों के अधीन हो गया। ई. 1831 में अलवर के राजा विनयसिंह ने यह दुर्ग ठाकुर भवानीसिंह राणावत को दे दिया जो मेवाड़ के सिसोदियों से सम्बन्धित था। इसमें अब हेरिटेज होटल चलता है।
28-सोनागढ़(जलेसर) --
संवत 1173 में बयाना के जदुवँशी राजा विजयपाल के पुत्र सोनपाल जी ने जलेसर के पास अपने नाम से सोना गांव बसाया तथा यदुवंश की ध्वजा पताका मेवातियों को मारकर इस क्षेत्र में फहराई।सोनागांव में एक गढ़ बनवाया जो सोनागढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ जो कालान्तर में ध्वस्त हो गया परन्तु राजा सोनपाल के वंशजों ने जलेसर क्षेत्र पर अपना कब्जा वरकरार रखा।
29-तोक्षीगढ़ किला --
अलीगढ़ के इगलास क्षेत्र में तोक्षीगढ़ 12 वीं सदी में जादों राजपूतों की कुड़ेरिया शाखा का ठिकाना था।महावन के राजा महिपाल के पुत्र तुच्छपाल ने अपने नाम पर तोच्छी नगर बसाया था तथा एक किला बनबाया था जो आज एक टीले की जगह को चिन्हित करता है। इस टीले का क्षेत्रफल लगभग 20 एकड़ है। यह किला /टीला जो अब खण्डहर स्थिति में है ,लगभग 15 फीट ऊंचा है। इस टीले के स्थान पर जादों राजा तोछपाल द्वारा एक किले की स्थापना की गई थी। बाद में किला मुस्लिम शासकों के आधिपत्य में भी रहा है।यह तोछीगढ़ का किला 18 सौ के दशक में हाथरस के पोर्च यदुवंशी राजपूत राजाओं ने जादों राजा तुच्छ पाल के वंशजों से छीन लिया।इसके बाद यह किला मराठों ,जाटों तथा अंग्रेजों के आधिपत्य में भी रहा।
30-गभाना का किला ---
गभाना अलीगढ़ जिले की एक प्रसिद्ध रियासत रही है। यह अलीगढ़ से 19.6 कि.मी. जी.टी. रोड पर स्थित है। यहां ग्वालियर राज्य के अधीन श्री चंदनसिंह की रियासत थी। उस समय सोमना और गभाना इन्हीं के अधीन थे। चंदनसिंह ने श्री लेखराज सिंह को गोद ले लिया ।रायबहादुर लेखराजसिंह के समय में ही किले के बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी लेकिन किला बाद उनके दोनों पुत्रों रायबहादुर लक्ष्मीराज सिंह और कुंवर देवेन्द्रराज सिंह ने निर्माण 1919 में पूर्ण कराया था। गभाना का किला जयपुर शैली पर बना हुआ है ।जयपुर की महारानी कुशल कंवर जो उमरगढ़ की बेटी थी गभाना परिवार को बहुत सम्मान देती थी।ठाकुर लेखराजसिंह का जयपुर बहुत आना -जाना भी रहा था।कुशल कंवर की ननिहाल कौरह-रुस्तमपुर रियासत के जमींदार ठाकुर सुखराम सिंह के यहां थी ।इस बजह से उनका सम्बन्ध गभाना परिवार से भी था।एक बार जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह द्वियीय अपनी महारानी कुशल कंवर के साथ पधारे थे जिनका ठाकुर लेखराज सिंह ने भव्य स्वागत एवं सत्कार किया था । रायबहादुर लक्ष्मीराज सिंह अंग्रेजी परम्परा के दरबारों में सक्रिय भागीदारी करते थे उनके बेटे चेतनराज सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष तथा एम.एल.ए. रहे थे। अलीगढ़ के मानिक चौक में भी राजा गभाना का आधिपत्य था ।
31-कोटला का किला--- -----
कोटिला का किला किसी समय अत्यंत महत्वपूर्ण रहा होगा ।सन् 1884 ई0 के गजेटियर में इस किले की रूप रेखा इस प्रकार दी गई है ।खाई 20 फ़ीट चौड़ी तथा 14 फ़ीट गहरी ,ऊंचाई 40 फ़ीट ।भूमि की परिधि 284 फ़ीट उत्तर ,220 फ़ीट दक्षिण तथा 320 फ़ीट पूर्व एवं 480 फ़ीट पश्चिम ।अब यह किला जीर्ण शीर्ण अवस्था में देखने में लगता है ।अभी कुछ ढांचा तो विद्यमान है शायद इसमे कोई सरकारी स्कूल चल रहा है ।यहाँ इसका उपरोक्त विवरण इसी उद्देश्य से दिया गया है कि भावी पीढियाँ इसके वास्तविक स्वरूप की कल्पना कर सकें।किले को कब और किसने बनवाया इसका कोई विवरण नही मिल पाया है ।लेकिन सम्भावना यह है कि यह पहले कच्ची गढ़ी होगी जो बाद में कोटला के राजा कुशलपाल सिंह बहादुर ने अपने पुत्र कुँवर गजेन्द्रपाल सिंह के त्रिपुरा राज्य से होने वाले विवाह से कुछ ही समय पूर्व लगभग सन 1920 -22 के मध्य पक्का बनवाया होगा।इस किले में कुछ जयपुर शैली भी नजर आती है ।जयपुर राजपरिवार से इनका नजदीकी सम्बन्ध था। बैसे भी यह परिवार आगरा में बाघफरजाना कोठी में रहता था।क्षेत्रीय लोगों से पूछने पर यही तथ्य अवगत हुए हैं ।प्रारम्भिक समय में इस रियासत में 55 गांव थे जो बाद में कम होकर रानी महताव कंवर के समय लगभग 42 गांव ही रह गए थे ।
32-अवागढ़ का किला---
ठा. विजयसिंह के स्वर्गवासी होने पर उनके पुत्र ठा बख्त सिंह उनके उत्तराधिकारी बने बख़्त सिंह ने कुछ समय के लिए भरतपुर के महाराजा जवाहर सिंह की सेना में एक सैनिक के रूप में नौकरी की थी । ठा. बख्त सिंह ने भी पिता की तरह क्षेत्रीय पड़ौसी जमींदारों को कर्ज देने का कार्य जारी रखा ।उमरगढ़ रियासत के तत्कालीन राव ठाकुर बहादुर सिंह का इनको पूरा सहयोग मिलता था तथा उनसे ही इन्होंने मीसा नामक गाँव प्राप्त किया था । इसके बाद काफी संख्या में दूसरे ठाकुरों के गांव बख्त सिंह के हाथों में आ गये थे और इन्होंने उनसे लगान बसूल करने के लिए वहां पर पाए जाने वाले लुटेरे मेवातियों की एक सेना भी बना ली थी। मेवातियों की मदद से बख्त सिंह ने अपने आप को क्षेत्र में स्थापित किया और ये मेवातियों की आर्थिक मदद भी करते थे। इस प्रकार उन्होंने अपनी जमींदारी में वृद्धि की और वे इस कार्य में इस सीमा तक सफल रहे कि शाहआलम (1759-1808 ) के शासन के 37 वें वर्ष तक 53 गांवों का स्वामित्व प्राप्त कर लिया था।और मराठा अधिकारी जनरल पैरोंन ने जिसको फौजी सेवा के उपलक्ष्य में जलेसर की जागीर मिली थी उसने 50 हजार रुपये की वार्षिक मांग के साथ इन गाँवों का सदैव के लिए स्थायी पट्टा कर दिया। इस के अतिरिक्त कुछ और गांवों की जमींदारी भी उनको प्रदान कर दी गयी । ग्वालियर के महादजी सिधिया ( 1733-1794 ) के समय बख्त सिंह गांव अवा, वीरनगर, पुन्हेरा, नूह, जिनावली तथा बड़ाभौंडेरा गांवों की लगभग 2542 बीघा जमीन पर मालगुजारी रहित अधिकार प्राप्त हो गया तथा कुछ जमीन लगभग 337 बीघा पिलखतरा में प्राप्त करली ।मराठों की एक सनद के अनुसार बख्तसिंह ने अवा को अपना मुख्य निवास बनाया और यह अवा-मीसा ताल्लुका के नाम से इसकी मान्यता मिल गयी और इसके साथ ही अवा गाँव में एक किला बनाने की आधार शिला रखने की शुरुआत हो गई ।उन दिनों बख्त सिंह की स्थिति एक स्वतंत्र शासक के रूप में थी और वह प्रभावशाली माने जाने लगे ।लोर्डलेक की मदद से बख़्त सिंह के पुत्र हीरा सिंह ने सन 1803 में अवा गांव में एक कच्चागढ़ बनवायाजो अवागढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।यह किला 1मील क्षेत्रफल में फैला हुआ है जिसमें काफी इमारतें तथा पुराने कुंआ मौजूद हैं।राजा पीताम्बर सिंह एवं राजा पृथी सिंह के समय में यह दुर्ग तथा अवागढ़ रियासत चर्म वैभव पर थी।
संदर्भ---
1-गज़ेटियर ऑफ करौली स्टेट -पेरी -पौलेट ,1874ई0
2-करौली का इतिहास -लेखक महावीर प्रसाद शर्मा
3-करौली पोथी जगा स्वर्गीय कुलभान सिंह जी अकोलपुरा
4-राजपूताने का इतिहास -लेखक जगदीश सिंह गहलोत
5-राजपुताना का यदुवंशी राज्य करौली -लेखक ठाकुर तेजभान सिंह यदुवंशी
6-करौली राज्य का इतिहास -लेखक दामोदर लाल गर्ग
7-यदुवंश का इतिहास -लेखक महावीर सिंह यदुवंशी
8-अध्यात्मक ,पुरातत्व एवं प्रकृति की रंगोली करौली -जिला करौली
9-करौली जिले का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन-लेखक डा0 मोहन लाल गुप्ता
10-वीर-विनोद -लेखक स्यामलदास
11-गज़ेटियर ऑफ ईस्टर्न राजपुताना (भरतपुर ,धौलपुर एवं
करौली )स्टेट्स -ड्रेक ब्रोचमन एच0 ई0 ,190
12-सल्तनत काल में हिन्दू-प्रतिरोध -लेखक अशोक कुमार सिंह
13-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -लेखक रतन लाल मिश्र
14-यदुवंश -गंगा सिंह
15-राजस्थान के प्रमुख दुर्ग-डा0 राघवेंद्र सिंह मनोहर
16-तिमनगढ़-दुर्ग ,कला एवं सांस्कृतिक अध्ययन-रामजी लाल कोली
17-भारत के दुर्ग-पंडित छोटे लाल शर्मा
18-राजस्थान के प्राचीन दुर्ग-डा0 मोहन लाल गुप्ता
19-बयाना ऐतिहासिक सर्वेक्षण -दामोदर लाल गर्ग
20-ऐसीइन्ट सिटीज एन्ड टाउन इन राजस्थान-के0 .सी0 जैन
21-बयाना-ऐ कांसेप्ट ऑफ हिस्टोरिकल आर्कियोलॉजी -डा0 राजीव बरगोती
22-प्रोटेक्टेड मोनुमेंट्स इन राजस्थान-चंद्रमणि सिंह
23-आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया रिपोर्ट भाग ,20.,पृष्ठ न054-60--कनिंघम
24-रिपोर्ट आफ ए टूर इन ईस्टर्न राजपुताना ,1883-83 ,पृष्ठ 60-87.--कनिंघम
25-राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गैज़ेटर्स -भरतपुर ,पृष्ठ,. 475-477.
26--राजस्थान का जैन साहित्य 1977
27-जैसवाल जैन ,एक युग ,एक प्रतीक
28-,राजस्थान थ्रू दी एज -दशरथ शर्मा
29-हिस्ट्री ऑफ जैनिज़्म -कैलाश चन्द जैन ।
30-ताहनगढ़ फोर्ट :एक ऐतिहासिक सर्वेक्षण -डा0 विनोदकुमार सिंह
31-तवारीख -ए -करौली -मुंशी अली बेग
32-करौली ख्यात एवं पोथी अप्रकाशित ।
33- करौली का यादव राज्य, रणवाकुरा मासिक में (जुलाई 1992) कुंवर देवीसिंह मंडावा का लेख ।
34-राजपूताने का इतिहास पृ० 308, ले० डॉ० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ।
35-विजयपाल रासौ ।
36 -सांस्कृतिक विरासतः बयाना नील: राजस्थान पत्रिका (24 दिसम्बर 95 ) में डा . भँवर भादानी का लेख ।37-तवारीख जैसलमेर -लखमी चन्द ,तवारीख करौली राज्य , पृष्ठ 334 -338।
38-मथुरा मेमो -ग्रॉउस ।
39-ब्रज संस्कृति विश्व कोष भाग 2
40-राजस्थान का इतिहास -कर्नल जेम्स टॉड
41-हिस्ट्री ऑफ दी राजपूत ट्राइब्स -मेटकाल्फ़
42-हैंडबुक आफ राजपूतस -कैप्टन बिंगले
43-भारत का वृहत इतिहास (भाग 1,2,3)-रमेश चंद्र मजूमदार
44-गजनी से जैसलमेर -हरि सिंह भाटी
45-दक्षिण भारत का राजनीतिक इतिहास लेखक डॉ0 अजय कुमार सिंह ।
45-भारत ज्ञानकोष
47-ऐतिहासिक स्थानावली लेखक विजेन्द्र कुमार माथुर।
48-देवगिरि के यादव लेखक राजमल वोरा
49-भारतीय इतिहास कोष लेखक सच्चिदानंद भाट्टाचार्य ।
50-दिल्ली सुल्तनत भाग 2 संपादक मोहम्मद हवीव ,खालिक अहमद निजामी ।
51-दकन का प्राचीन इतिहास संपादक जी याजदानी ।
52-विजयनगर -साम्राज्य का इतिहास , भूमिका लेखक-डॉ0 रामप्रसाद त्रिपाठी एवं लेखक -श्री वासुदेव उपाध्याय ।
53-दिल्ली सल्तनत 1206-1526 ,संपादक मोहम्मद हबीव ,खलिक अहमद निजामी
54-राजस्थान डिस्ट्रिक्ट जैसलमेर गजेटियर
लेखक--– डॉ. धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-लढोता, सासनी
जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश
प्राचार्य ,राजकीय कन्या महाविद्यालय ,सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ,322001
Comments
Post a Comment