ब्रजमंडल के गांव बंदी में विराजमान बंदी -आनंदी देवियों का ऐतिहासिक शोध --


ब्रजमंडल के गांव बंदी में विराजमान बंदी -आनंदी देवियों का ऐतिहासिक शोध --
   एक पौराणिक कथा के बारे में भ्रामक अर्थ समझने का बड़ा रोचक उदाहरण मथुरा जिले में बलदेव -राया मार्ग पर स्थित जादौन राजपूतों के बहुत बड़े एवं प्रसिद्ध गांव बंदी में मिलता है ।इस गांव में बंदी,आनंदी और मनोवांछा देवी का मंदिर है ।इन देवियों के इतिहास के विषय में कई किवदंतियां है ।
   एक किवदंती के अनुसार बंदी -आनंदी यशोदा जी की दो परिचारिकाएं थी जिनका विशेष काम गायों के वाडे की सफाई और उनके कंडे वानाना था ।किन्तु मंदिर के आँगन में शिलालेख जो सम्वत 1575 का है उसमें आनंदी का कोई उल्लेख नहीं है ।कुछ भाग अस्पस्ट है किन्तु जो शब्द पढे जासकते है वो इस प्रकार है "स्वस्ती श्री सर्वो परि व्रज नंदन बंदी जी ।तस्य सेवक ।"इससे यह अंदाज लगाया जा सकता है कि आनंदी का नाम पंक्ति की तुकांत करने के लिए जोड़ा गया है और वहां पर एक और पुराणी आकृति देखी गयी है जिसका कोई नामहोना चाहिए ।मूल शब्द बंदी अकेला था।गोकुल गोसाई इस सिद्धान्त को आगे बढ़ाते हैऔर इसके प्रादुर्भाव को बताते हुये वन यात्रा की नाटकीय प्रस्तुती में बंदी में गोबर लीला को नियमित दृश्य के रूप में दिखाते है ।किन्तु यहां के निवासी इस बात को स्वीकार नही करते है और कहते है कि स्थानीय जो देवी है वो कृष्ण के समय सेपहले ही पूजी जाती रही है और भगवान् श्री कृष्ण के केस मुंडन के बाद प्रथम केशोत्सर्जन कर यहां लाया गया था जो बंदी की प्राचीनता और मथुरा के भगवान् श्री कृष्ण केसंबंध को सिद्ध करती है ।दोनों ही देवियों की मूर्तियां  जिन्हें यशोदा जी की परिचारिकाएं माना जाता है वो देवी दुर्गा की मूर्तियाँहै ।एक में उनको आठ भुजाओं के साथ महिषासुर का दमन करते हुये देखा जा सकता है और दूसरी मूर्ति में जो उस की आधुनिक पृकृति है जिसे वृंदावन में बनाया गया है जिसमें चार भुजाएं ,दो मालाएं गले पर दो सर के ऊपर दिखाई देती है।
श्रीजी की सखियां बंदी-आनंदी से ब्रजवासी बहुत स्नेह करते है ।शायद इस लिए लोक परम्पराओं से पोषित बंदी -आनंदी देवी के रूप में पूजी जाने लगी ।वर्तमानमें बंदी एक सिद्ध पीठ के रूप में प्रतिष्ठित है ।बंदी के नाम पर जादौन राजपूतों का यह गांव बसा है ।दाऊजी से थोड़ी दूर है ।मंदिर पुजारी के अनुसार "लोग यहाँ अपने बच्चों का मुंडन-संस्कार कराटे है ।
दूसरी किवदंती के अनुसार पहले बंदी देवी महावन गांव में थी ।बाद में यहाँ स्थापित की गई है ।इसमे भागवत के दशम स्कंध का सन्दर्भ देकर लिखा है कि उग्रसेन के बेटे राजा कंस के बंदीगृह में वासुदेव -देवकी ने प्रार्थना की ,हे महाशक्ति !हमारी बंदी छुड़ाओ ।बंदीगृह में आदिशक्ति ने प्रकट होकर वसुदेव और देवकी जी को बंधन मुक्त कर कहा ,जो बालक पैदा हो , उसे नंदबाबा के घर गोकुल में पहुंचा देना ।ऐसा कह कर वे अंतर्ध्यान हो गई।इस लिए बंदी कहलाई।श्री कृष्ण जी के प्रपौत्र यदुकुल के प्रवर्तक महाराज श्री वज्रनाभ जी ने महावन में इनका मंदिर बनवाया ।मुगलकाल के प्रारम्भ में राजा वरन सिंह के संरक्षण में इन देवियों को बंदी गांव पहुँचाया गया ।राजा ने मंदिर और कुण्ड का निर्माण कराया ।मुग़ल शासक औरंगजेब भी बंदी को खंडित नहीं कर सका ।सन् 1312 ई0 में बंदी के नाम पर गांव की स्थापना हुई ।आगरा के सेठ घासीराम ने मंदिर की मरम्बत कराई ।चैत्रमास की चौदस को माँ के स्थापना दिवस के सन्दर्भ में मेला का आयोजन होता है ।इस किवदंती के अनुसार बंदी -आनंदी गोपियां नन्द जी के यहाँ गोबर थेपती थी ।उनके जीवन का उदेश्य भगवान् श्री कृष्ण जी के दर्शन पाना था। इस भक्ति के कारण दोनों ही गोपियां वहां देवी के रूप में स्थापित हो गई ।
    अन्य किवदंती के अनुसार गोवर्धन पर्वत पर हुये भगवान् श्री कृष्ण जी के श्रृंगार में बंदी -आनंदी नाम की सखियां भी उपस्थित थी ।बंदी ने श्यामा को तरकियां और आनंदी ने भाल तोरण भेंट किया (गर्ग संहिता ,20 वां अध्याय )।सख्य रस और भाव निकुंजी पुस्तक के अनुसार बंदी,आनंदी सखियों का जन्म महावन में हुआ था।दोनों बहिनें भगवान श्री कृष्ण जी बुआ थीं ।नारद मुनि के उपदेश पाकर कृष्ण नाम उच्चारण करती हुई उपले थेपती थी ।इनके समान प्रभु श्री कृष्ण जी का दर्शनांद किसी को नहींमिला ।दोनों सखियां प्रभु की एकांकी शक्ति स्वरूपा थी ।गोवर्धन धारण के समय सातों दिन व् रात्रि में कंस व् उसके अनुयायियों की आँख में धूल फैंक कर अँधा बना देना और छाव के अंदर सुरक्षित रहने वालों को आनंद प्रदान करते रहना आनंदी सखी का काम था ।
इसी प्रकार प्रभु श्री कृष्ण जी के जन्मकाल पर मथुरा जेल के द्वार खोलना ,वासुदेव जी की हथकड़ियाँ ,जेल आदि को तोडना ,रक्षकों को चेतना रहित कर देना ,यशोदा सहित गोकुलवासियों को भी चेतना रहित कर देने का कार्य बंदी सखी का था ।इन दोनों बुआओं की यादगार के लिए यदुकुल वंश प्रवर्तक महाराज श्री वज्रनाभ जी ने बंदी -आनंदी जी की गांव के दक्षिणी भाग में इनकी प्रतिमा स्थापित की थी ।
  जय बंदी -आनंदी देवियों की ।
लेखक -डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
       गांव- लढोता ,सासनी
       जिला-हाथरस ,उत्तरप्रदेश।

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